लठियानी विनोद शर्मा

गोविंद सागर की गहराइयों में समाया हिमाचल का प्राचीन वैभव बिलासपुर के डूबे मंदिरों की कुछ कहानी
हिमाचल प्रदेश का बिलासपुर जिला सदियों तक एक समृद्ध, सुसंस्कृत और वैभवशाली रियासत के रूप में जाना जाता रहा है। लगभग 500 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से भी उत्तर भारत की अनमोल धरोहरों में गिना जाता था। सतलुज नदी के किनारे बसा यह नगर इतिहास के उन अध्यायों को समेटे हुए था, जिनकी गूंज आज भी गोविंद सागर झील की लहरों में सुनाई देती है।
राजपूत शौर्य और सांस्कृतिक गौरव की भूमि
बिलासपुर के शासक एक कुलीन राजपूत वंश से संबंध रखते थे, जिन्होंने कभी हिमाचल प्रदेश के एक बड़े भूभाग पर शासन किया। ये शासक केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि कला, धर्म और स्थापत्य के महान संरक्षक भी थे। उनके संरक्षण में बिलासपुर ने एक ऐसी पहचान गढ़ी, जो उसे अन्य पहाड़ी रियासतों से अलग और विशिष्ट बनाती थी।
भारत का पहला नियोजित पहाड़ी शहर
17वीं शताब्दी में निर्मित बिलासपुर को भारत के पहाड़ी क्षेत्रों का पहला सुनियोजित नगर माना जाता है। चौड़ी गलियाँ, व्यवस्थित बाजार, मंदिरों की श्रृंखलाएँ और धार्मिक घाट—यह नगर अपने समय से कहीं आगे था। इसकी सबसे बड़ी पहचान इसकी निर्मित विरासत थी, जिसमें 6वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक के 28 प्राचीन हिंदू मंदिर शामिल थे। ये मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि आस्था, कला और इतिहास के जीवंत प्रतीक थे।
विकास की कीमत और इतिहास का डूबना
जब 225.5 मीटर ऊँचे भाखड़ा-नांगल गुरुत्वाकर्षण बाँध का निर्माण हुआ, तो इसके साथ ही विकास और बलिदान की एक मूक कहानी भी लिखी गई। इस परियोजना के कारण बिलासपुर शहर और उसके आसपास की लगभग 30,000 एकड़ भूमि जलमग्न हो गई। पुराना बिलासपुर, चौदह गाँवों सहित, गोविंद सागर झील की अथाह गहराइयों में समा गया।
आज का बिलासपुर शहर ऊँचाई पर बसा है,
एक ऐसा नया नगर, जो उस समय आकार ले रहा था, जब पुराना नगर धीरे-धीरे जलसमाधि ले रहा था।
गोविंद सागर में डूबे मंदिर: इतिहास की परछाइयाँ
गोविंद सागर झील में डूबे मंदिर 17वीं–18वीं शताब्दी के उस पुराने बिलासपुर के अवशेष हैं, जो 1960 के दशक में भाखड़ा बाँध के निर्माण के साथ इतिहास बन गया। इनमें सबसे प्रमुख था श्री रंगनाथ मंदिर। सर्दियों के मौसम में, जब जलस्तर घटता है, तब ये मंदिर जल से बाहर झाँकते हैं—मानो समय स्वयं अपनी परतें खोल रहा हो। यह दृश्य दुर्लभ, रहस्यमय और अत्यंत भावुक कर देने वाला होता है।
आस्था को सबसे गहरा आघात
शहर के जलमग्न होने से बिलासपुर के 28 छोटे-बड़े मंदिरों को सबसे अधिक क्षति पहुँची। इनमें से अधिकांश मंदिर शास्त्रीय ‘नागरा’ स्थापत्य शैली में निर्मित थे। तीन मंदिर विशाल और भव्य थे, जबकि शेष छोटे किंतु कलात्मक थे। सौभाग्यवश, कई प्रतिमाओं और मूर्तियों को समय रहते अन्य स्थानों पर स्थानांतरित कर दिया गया, और कुछ उत्कृष्ट नक्काशियों को शिमला के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया।
फिर भी, जलमग्न हो चुका यह नगर अपनी संपूर्ण विरासत सहित इतिहास के गर्भ में चला गया।
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आधुनिक भारत का मंदिर’ और प्राचीन मंदिरों का बलिदान
ये संरचनाएँ पुराने बिलासपुर के उन 28 मंदिरों के अवशेष हैं, जिनका निर्माण छठी से सत्रहवीं शताब्दी के बीच हुआ था। इनके जलमग्न होने के साथ ही भाखड़ा-नांगल बाँध का मार्ग प्रशस्त हुआ, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘आधुनिक भारत का मंदिर’ कहा था। यह विडंबना ही है कि आधुनिक भारत का मंदिर, प्राचीन भारत के मंदिरों की आहुति लेकर खड़ा हुआ।
डूबता नगर, अमर स्मृतियाँ
1963-64 में पुराना बिलासपुर नगर गोविंद सागर झील में समा गया। यह नगर अपने 28 से अधिक मंदिरों के कारण पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध था। जल ने नगर को निगल लिया, पर उसकी स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं।
स्थापत्य का अद्वितीय अध्याय
इन मंदिरों का निर्माण मुख्यतः 17वीं-18वीं शताब्दी में हुआ था। इनमें प्रमुख शैव पीठ श्री रंगनाथ मंदिर था, जो वास्तुकला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
श्री रंगनाथ मंदिर समूह: आस्था का केंद्र
पुराने बिलासपुर के केंद्र में स्थित श्री रंगनाथ मंदिर समूह पाँच छोटे-बड़े मंदिरों का समूह था। पत्थरों से निर्मित ये मंदिर शिव, पार्वती, सती, काली, गणेश, हनुमान, शीतला देवी और छडोल रानी को समर्पित थे।
मंदिर का चबूतरा अशोक और पट्टाडकल के मंदिरों से मिलता-जुलता था, जिससे बिलासपुर के शासक वंश की उत्पत्ति जोड़ी जाती है। मान्यता है कि लगभग हजार वर्ष पुराना यह रंगनाथ मंदिर शिव को समर्पित था। जनविश्वास के अनुसार, जब इस मंदिर में जलधारा अर्पित की जाती थी और वह सतलुज में मिलती थी, तो वर्षा अवश्य होती थी।
अन्य जलमग्न मंदिरों की विरासत
खानमुकेश्वर मंदिर दो जुड़वाँ मंदिर, जो शिव और कार्तिकेय को समर्पित थे।ऊँचे चबूतरों पर स्थित थे। इनके अतिरिक्त गोपालजी मंदिर, करकरी का मंदिर, घर स्थित मंदिर और पुंज-रुखी मंदिर भी इस जलसमाधि का हिस्सा बने।
छोटा हरिद्वार, छोटा ऋषिकेश
बिलासपुर के शासकों ने उन श्रद्धालुओं के लिए हरिद्वार और ऋषिकेश की प्रतिकृतियाँ बनवाईं, जो वहाँ तीर्थयात्रा नहीं कर सकते थे। राजा बिजय चंद ने अपने निजी उपयोग के लिए 40 कमरों की भव्य हवेली भी बनवाई थी। दुर्भाग्यवश, ये सभी स्थापत्य धरोहरें अब जल के नीचे हैं।
जब जलाशय का पानी घटता है, तो ये “लुप्त खजाने” पुनः दृष्टिगोचर होते हैं।एक ऐसा दृश्य जो दर्शकों को विस्मय और श्रद्धा से भर देता है। पुराने शहर के सांडू मैदान में कभी लगभग 119 मंदिर हुआ करते थे।
विरासत, संरक्षण और पुनर्जागरण
बिलासपुर को कभी ‘छोटा हरिद्वार / छोटा ऋषिकेश’ कहा जाता था। इसी विरासत को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से हिमाचल प्रदेश सरकार ने 1,400 करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी परियोजना की परिकल्पना की है।
बिलासपुर के जलमग्न मंदिरों की विरासत स्थानांतरण परियोजना तीन चरणों में संचालित की जाएगी। इसका उद्देश्य न केवल इन मंदिरों का संरक्षण है, बल्कि बिलासपुर को एक प्रमुख धार्मिक-पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करना भी है।
वर्तमान स्थिति और भविष्य की चिंता
जलस्तर घटने पर ये मंदिर क्षणिक रूप से दिखाई देते हैं, किंतु समय, पानी और उपेक्षा के कारण इनके स्थायी रूप से लुप्त होने का खतरा बना हुआ है। यदि समय पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अमूल्य विरासत केवल पुस्तकों और स्मृतियों तक सीमित रह जाएगी।

