ऊना ब्यूरो रिपोर्ट, शिवानी ठाकुर

घनौली स्थित शिव मंदिर कमेटी न्यू साहूमाजरा में कथावाचक सुरेश मौदगिल डोहेकश्वर धाम वाले ने श्रोताओं को अवगत करवाते हुए बताया कि शास्त्रों में कहा गया है कि जन्म के समय किया गया दान और मरते समय की भावना ये दोनों ही मानव के भविष्य की दिशा तय करते हैं। जन्म के समय का दान जीवन में संस्कार, समृद्धि और सद्गति का बीज बोता है, वहीं अंतिम क्षणों की पवित्र भावना आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करती है। जो मनुष्य जीवन के आरंभ और अंत दोनों को धर्म, दया और दान से जोड़ देता है, उसका जीवन स्वयं एक यज्ञ बन जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण और पूतना उद्धार लीला
कथा वाचक ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ करुणा की पराकाष्ठा हैं। पूतना, जो वध की भावना से आई थी, प्रभु के स्पर्श मात्र से उद्धार को प्राप्त हुई। यह लीला बताती है कि श्रीकृष्ण की शरण में आने वाला even दोषयुक्त भी मोक्ष का अधिकारी बन जाता है। प्रभु की कृपा शत्रु और भक्त में भेद नहीं करती, वह केवल भाव देखती है।
साधु-संत का सत्कार ईश्वर का स्वागत
शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है।
“संत समागम हरि कथा, दुर्लभ मानुष देह।”
जो घर साधु-संत के चरणों से पवित्र होता है, वहाँ स्वयं नारायण का वास होता है। अतः जब भी कोई साधु-संत आपके घर पधारें, उनका आदर-सम्मान अवश्य करें, क्योंकि वे केवल व्यक्ति नहीं, चलती-फिरती तीर्थभूमि होते हैं।
गोकुल धाम — गौ सेवा का आदर्श
गोकुल धाम में गौ माता की सेवा केवल व्यवस्था नहीं, अपितु साधना है। यहाँ गाय को माता के समान सम्मान, उत्तम आहार, स्वच्छ आश्रय और प्रेमपूर्ण देखभाल प्राप्त होती है। जहाँ गौ की रक्षा होती है, वहाँ लक्ष्मी, धर्म और शांति स्वतः वास करते हैं।
वृंदावन का भजन — भक्ति का मधुर स्वर
वृंदावन कैसा है?
मन चल रे वृंदावन धाम,
राधे-राधे गाए रे…
कदम-कदम पर प्रेम बरसे,
कण-कण में श्रीश्याम।
वृंदावन की शोभा निराली है।
जहाँ यमुना की लहरों में भक्ति बहती है,
जहाँ हवा भी “राधे-राधे” गुनगुनाती है,
और जहाँ पत्थर-पत्थर में श्रीकृष्ण की लीला बसती है।
वंशी वट दिव्य रहस्य और माधुर्य
कथा वाचक सुरेश मौदगिल ने बताया कि वृंदावन का वंशी वट केवल वृक्ष नहीं, श्रीकृष्ण की लीलाओं का साक्षात साक्षी है। इस वट वृक्ष की छह टहनियाँ हैं, और आश्चर्य यह कि प्रत्येक टहनी से अलग-अलग ध्वनि सुनाई देती है, मानो आज भी श्रीकृष्ण की वंशी वहाँ गूँज रही हो। यह स्थान भक्तों के लिए ध्यान, प्रेम और आध्यात्मिक अनुभूति का केंद्र है।
विधि-विधान का महत्व
कोई भी कार्य यदि विधि-विधान के बिना किया जाए, तो वह पूर्ण फल नहीं देता। शास्त्रों की विधि हमें अनुशासन, शुद्धता और सही दिशा प्रदान करती है। इसलिए चाहे पूजा हो, यज्ञ हो या जीवन का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य
उसे विधि-विधान से करना ही सफलता का मार्ग है।
यह समस्त प्रसंग हमें यही सिखाते हैं कि जीवन केवल कर्मों से नहीं, भाव, भक्ति और मर्यादा से भी बनता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, साधु-संग से लेकर गौ-सेवा तक, और वृंदावन की धूल से लेकर वंशी वट की छाया तक
हर क्षण हमें धर्म और प्रेम की ओर बुलाता है

