Tuesday, April 14, 2026
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महंत पुनीत गिरि जी महाराज के वचनों से निहाल हुए श्रद्धालु, अष्टावक्र गीता को बताया आत्म-कल्याण का मार्ग

धर्मशाला-राकेश कुमार

बहादुर जोधामल सराय के न्यू हॉल में आयोजित ‘श्री हनुमन्त कथा एवं अष्टावक्र गीता ज्ञान महायज्ञ’ के भव्य शुभारंभ के साथ ही क्षेत्र का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया है। कथा के प्रथम चरण में श्रद्धेय परम पूज्य महंत पुनीत गिरि जी महाराज ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि जब मनुष्य के भीतर सुनने की सच्ची क्षमता जाग्रत हो जाती है, तो उसे संसार में कुछ भी शेष करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। महाराज श्री ने अष्टावक्र गीता के सूत्रों की व्याख्या करते हुए बताया कि आत्म-साक्षात्कार केवल दिव्य दृष्टि और गुरु की कृपा से ही संभव है। उन्होंने श्रवण की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि जो पूर्ण तन्मयता से परमात्मा के वचनों को सुनता है, वह कर्मों के बंधन से स्वतः ही मुक्त होने लगता है।
कथा के दौरान महंत जी ने हनुमान जी के सेवा भाव और अष्टावक्र जी के ज्ञान का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हनुमान जी ने स्वयं को पूरी तरह राम जी के चरणों में समर्पित कर दिया, ठीक वही समर्पण एक शिष्य का गुरु के प्रति होना चाहिए। महाराज श्री के ओजस्वी प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। दोपहर 2:00 बजे से शुरू होने वाले इस सत्संग में महाराज श्री ने स्पष्ट किया कि परमात्मा को बाहर खोजने के बजाय अपने भीतर खोजने का प्रयास करें, क्योंकि वह परम सत्ता हमारे अत्यंत निकट है। कार्यक्रम के अंत में दिव्य आरती हुई, जिसमें भक्तों ने भावविभोर होकर हिस्सा लिया। यह ज्ञान यज्ञ 9 अप्रैल तक अनवरत जारी रहेगा।

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