Wednesday, June 10, 2026
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सच्चे संतो के सतसंग, नामदान और अच्छे कर्मों से संवरता है लोक-परलोक— बाबा उमाकांत जी महाराज

नशामुक्त और शाकाहारी समाज से आएगी खुशहाली

जागो!चिंतपूर्णी,हिमाचल प्रदेश

चिंतपूर्णी,हिमाचल प्रदेश देश-विदेश जगह-जगह जाकर सतसंग के माध्यम से लाखों लोगों को शाकाहारी सदाचारी नशामुक्त बनाकर इसी मानव मंदिर में जीते जी देवी और देवताओं के साक्षात दर्शन का रास्ता (नामदान) बताने वाले इस समय के महान समाज सुधारक हिमाचल प्रदेश के चिंतपूर्णी स्थित ग्रीन वेली में आयोजित सतसंग समारोह में परम पूज्य बाबा उमाकांत जी महाराज ने फरमाया कि प्रभु की विशेष कृपा से ही मनुष्य को सतसंग का अवसर मिलता है। प्रवचन और धार्मिक आयोजन तो अनेक होते हैं, लेकिन सच्चा सतसंग दुर्लभ होता है, जो मनुष्य को सुख, शांति और लोक-परलोक संवारने का मार्ग दिखाता है।

मानव जीवन का उद्देश्य समझने के लिए सतसंग जरूरी

उन्होंने बताया कि मनुष्य शरीर पांच तत्वों से बना है और इसका उद्देश्य केवल भोग-विलास नहीं, बल्कि आत्मकल्याण है। सतसंग के बिना मनुष्य अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझ पाता और अज्ञानवश ऐसे कर्म कर बैठता है जिनका फल भोगना पड़ता है। इसलिए सत्संग सुनकर अच्छे कर्मों का मार्ग अपनाना चाहिए, जिससे 84 लाख योनियों और दुखों से बचकर मानव जीवन सफल बनाया जा सके।

नामदान का लाभ स्वयं अनुभव करके देखिए

बाबा जी ने नामदान से पूर्व श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि यदि आपने पहले किसी गुरु से दीक्षा ली है तो उनका सम्मान करें, लेकिन यह भी देखें कि उनके बताए मार्ग से आपको कितना लौकिक, पारलौकिक और आध्यात्मिक लाभ मिला। अब जो नाम बताया जाएगा, उसे भी स्वयं करके देखिए। यदि इससे जीवन में शांति, सुख और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होने लगे तो अंतर में देवी देवताओं का दर्शन होने लगे उसे अपनाइए।

यह आध्यात्मिक मार्ग सभी के लिए खुला है

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई व्यापारी अधिक लाभ और उन्नति वाली जगह पर अपनी दुकान चलाता है, वैसे ही साधक को भी उस साधना को अपनाना चाहिए जिससे वास्तविक लाभ और आत्मिक शांति प्राप्त हो। यह मार्ग किसी एक जाति, धर्म या वर्ग के लिए नहीं है।
चाहे स्त्री हो या पुरुष, अमीर हो या गरीब, विद्यार्थी, कर्मचारी, व्यापारी या मजदूर—हर व्यक्ति इसका अभ्यास कर सकता है। इसके लिए घर-परिवार त्यागने की आवश्यकता नहीं है।

हाथ जोड़कर विनय हमारी
तजो नशा बनो शाकाहारी

बाबा जी ने सभी से हाथ जोड़कर विनम्र आग्रह किया कि नशामुक्त, सदाचारी और शाकाहारी जीवन अपनाएं। उन्होंने कहा कि किसी भी पशु-पक्षी का मांस, मछली या अंडा नहीं खाना चाहिए। जीवों पर दया करना ही सच्ची मानवता और धर्म का आधार है उन्होंने कहा कि जो लोग गाय को माता मानते हैं, उसका दूध पीकर अपना जीवन चलाते हैं, उनके मांस को नहीं खाना चाहिए।
मनुष्य को ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी बेजुबान जीव को कष्ट पहुंचे। दया, प्रेम और अहिंसा का मार्ग ही मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।

प्रकृति का न्याय अटल है, कर्मों का फल अवश्य मिलता है

बाबा जी ने समझाया कि प्रकृति का नियम अटल है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। जब मनुष्य प्रकृति और धर्म के नियमों के विरुद्ध चलता है तो उसका परिणाम भी उसे भुगतना पड़ता है।
बाबा जी ने कर्मों के अटल विधान को समझाते हुए कहा कि जब रावण ने अहंकार और अधर्म का मार्ग अपनाया तो उसकी सोने की लंका, अपार धन-दौलत, लाखों पुत्र-पौत्र और विशाल साम्राज्य भी उसे बचा नहीं सके। भगवान श्रीराम के न्याय के सामने उसका सारा वैभव नष्ट हो गया। इसी प्रकार महाभारत में कौरवों के पास विशाल सेना, शक्ति और राजपाट था, लेकिन जब उन्होंने धर्म का साथ छोड़ दिया तो मात्र 18 दिनों में उनका सब कुछ समाप्त हो गया। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में अच्छे कर्म, दया, शाकाहार और ईश्वर भक्ति को स्थान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि समाज नशामुक्त, शाकाहारी और सदाचारी बन जाए तो परिवार, समाज और देश में सुख, शांति और खुशहाली का वातावरण स्थापित हो सकता है।

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