रोहित जसवाल

हरौली । कर्म का त्याग संन्यास नहीं है. कर्म का त्याग मन का त्याग नहीं है. कर्म के त्याग से भ्रांति मात्र उत्पन्न होती है जो ख़तरनाक है. संसार के बीज मन में अपना डेरा जमाए बैठे हैं. नदी, पहाड़, जंगल में एक तरह की शांति है, पर यह शांति उनकी है मन की नहीं. कई बार हम इसे मन की शांति मान लेते हैं, यहीं भूल हो जाती है.
उक्त अमृतवचन शिव महापुराण कथा के समापन सत्र में परम श्रद्धेय भागवताचार्य स्वामी अतुल कृष्ण जी महाराज ने ठाकुरद्वारा बढेड़ा, हरोली में व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि पहाड़ या जंगल में आने पर एक भ्रान्ति पैदा हो जाती है कि देखो मैं कैसा शांत हो गया. जिंदगी, जहां हम अकेले हैं, वहां स्वभावतः अवसरों से शून्य है. इसका अर्थ यह है कि एक शांति जो बाहर है, गलती से हम उसे अपना समझ लेते हैं. सच्चाई तो यह है कि मन की अशांति भीतर छिपी हुई है, जहां भी अवसर आया, बीज फिर से पल्लवित हो जाएंगे. कर्मों को छोड़ देना संन्यास नहीं है, जबकि सदियों से यही चलता रहा की कर्मों को छोड़ना ही संन्यास है. इस बात की घोषणा करना भी संन्यास नहीं है कि मैं सन्यासी हूं. घोषणा से क्या होगा. घोषणा भी तो अहंकार का ही एक रूप है कि मैं सन्यासी हूं.
महाराजश्री ने कहा कि आहार की शुद्धि होने पर सत्व की शुद्धि होती है. आंसू दुख के भी होते हैं और आनंद के भी, दुख के आंसू तो मिट जाते हैं, आनंद के आंसू अमृत हैं, उनके मिटने का कोई उपाय नहीं. आनंद के आंसू झरें, इससे ज्यादा शुभ और कोई लक्षण नहीं है. आनंद में हंसना इतना गहरा नहीं होता, जितना आनंद में रोना गहराई तक हमें ले जाता है. मुस्कुराहट परिधि पर उठी हुई तरंगें हैं और आंसू तो अंतर्गर्भ से प्रकट होते हैं. आज कथा में भगवान शिव के हनुमद अवतार, कृष्ण दर्शन अवतार, यतीश्वर अवतार, वैश्यनाथ अवतार एवं महाशिवरात्रि के महत्व को लोगों ने बड़ी श्रद्धा से सुना.
इस अवसर पर प्रमुख रूप से श्री श्री 1008 स्वामी यश गिरी जी महाराज, प्रीतम सिंह, जोगिंदर सिंह, मलकीत सिंह, हरि कृष्ण शास्त्री, होशियार सिंह, श्यामलाल, रमेश चंद्र, सतीश कुमार, राकेश कुमारवी, हरीश कुमार, सुखविंदर सिंह बग्गा, राजिंदर सिंह, कुलदीप सिंह, अनूप सिंह, वीरेंद्र कुमार, सुरेंद्र कुमार, धर्मपाल, देवराज, कुलविंदर सिंह, हर्षदीप, सुषमा, चरणजीत कौर इत्यादि उपस्थित रहे.।

