Tuesday, March 17, 2026
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ब्रह्मज्ञान द्वारा ‘शिवत्व’ का अनुभव ही सच्ची शिवरात्रि: साध्वी राजवंत भारती जीमहाशिवरात्रि के उपलक्ष्य में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ने दिया नशे के विरुद्ध आध्यात्मिक संदेश

दौलतपुर चौक, 15 फरवरी (संजीव डोगरा):

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, गौतम नगर आश्रम, होशियारपुर में महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर एक विशेष आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी राजवंत भारती जी ने भगवान शिव के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महादेव का प्रत्येक श्रृंगार मानव जाति के लिए भक्ति मार्ग का मार्गदर्शक है। उन्होंने बताया कि शिव को ‘त्रयम्बकम’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘तीन नेत्रों वाले’। भगवान शिव ने इसी तीसरे नेत्र से कामदेव का दहन किया था, जो वास्तव में हमारे भीतर की अनियंत्रित इच्छाओं और विकारों का प्रतीक है। साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि यह दिव्य तृतीय नेत्र हर मनुष्य के भीतर सुप्त अवस्था में विद्यमान है, जिसे केवल एक ब्रह्मनिष्ठ पूर्ण सतगुरु की कृपा से ही जाग्रत किया जा सकता है। शिव द्वारा धारण की गई नरमुंडों की माला हमें जीवन की नश्वरता के प्रति सचेत करती है कि यह शरीर क्षणभंगुर है, इसलिए मृत्यु से पूर्व आत्म-कल्याण का मार्ग चुनना अनिवार्य है।
साध्वी जी ने वर्तमान समाज में शिवरात्रि मनाने के ढंग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज शिव के नाम पर अश्लील गानों, शोर-शराबे और भांग-गांजा जैसे नशीले पदार्थों का सेवन किया जा रहा है। उन्होंने वास्तविकता स्पष्ट करते हुए कहा कि महादेव भांग का नहीं, बल्कि ‘नाम’ की खुमारी और योग का नशा करते थे। शिव का अर्थ है ‘कल्याण’ और उनके नाम पर नशा करना समाज का पतन है। अंत में उन्होंने शिव को ‘संहारकर्ता’ के रूप में परिभाषित करते हुए बताया कि जब एक साधक गुरु से दीक्षित होकर भक्ति पथ पर बढ़ता है, तो गुरु उसके जीवन में ‘महादेव’ की भूमिका निभाते हैं। गुरु शिष्य के भीतर के कुविचारों, दुष्प्रवृत्तियों और कुसंस्कारों का संहार कर उसके व्यक्तित्व को निर्मल और श्रेष्ठ बनाते हैं। इस कार्यक्रम में भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे, जिन्होंने शिव भक्ति के वास्तविक अर्थ को समझा।

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