
UGC और केंद्र सरकार द्वारा MD/MS जैसे महत्वपूर्ण चिकित्सा पाठ्यक्रमों में केवल 40 अंकों पर प्रवेश देने के निर्णय को संविधान विरोधी बताते हुए स्वर्ण समाज हिमाचल प्रदेश सहित विभिन्न छात्र संगठनों ने राष्ट्रपति भारत गणराज्य को ज्ञापन सौंपा।
छात्र संगठनों ने इस फैसले को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 21 और 21-A का सीधा उल्लंघन करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि इसे तुरंत वापस नहीं लिया गया तो इसका सीधा असर देश की स्वास्थ्य सेवाओं और आम नागरिकों के जीवन पर पड़ेगा।
मेरिट खत्म, मनमानी शुरू
ज्ञापन में साफ तौर पर कहा गया है कि MD/MS जैसे संवेदनशील चिकित्सा पाठ्यक्रमों में मेरिट से समझौता करना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। 40 अंकों पर प्रवेश की अनुमति देकर योग्य और मेहनती छात्रों के अधिकार छीने जा रहे हैं, जबकि संविधान समान अवसर और योग्यता आधारित चयन की गारंटी देता है।
संविधान के पांच अनुच्छेदों का उल्लंघन
छात्र संगठनों के अनुसार यह फैसला—
अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) को कमजोर करता है।
अनुच्छेद 15 के तहत निषिद्ध भेदभाव को बढ़ावा देता है।
अनुच्छेद 16 में निहित योग्यता आधारित अवसरों को समाप्त करता है।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार को खतरे में डालता है।
अनुच्छेद 21-A के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार पर सीधा प्रहार करता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था से समझौता नहीं छात्र संगठनों ने दो टूक कहा कि कम योग्यता के आधार पर विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करना देश की चिकित्सा गुणवत्ता को गिराने जैसा है। इसका खामियाजा सीधे आम जनता को भुगतना पड़ेगा, जिसे इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों पर निर्भर रहना होता है।
फैसला तुरंत वापस लेने की मांग ज्ञापन में राष्ट्रपति से मांग की गई है कि UGC के इस निर्णय को तत्काल रद्द किया जाए,
MD/MS प्रवेश प्रक्रिया को पूरी तरह मेरिट आधारित और पारदर्शी बनाया जाए,
सभी योग्य छात्रों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। ज्ञापन पर दर्ज सैकड़ों हस्ताक्षर इस बात के गवाह हैं कि यह मुद्दा केवल छात्रों का नहीं, बल्कि देश की चिकित्सा व्यवस्था और संविधान की आत्मा से जुड़ा सवाल बन चुका है।

