Sunday, September 6, 2026
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रक्षाबंधन से गुग्गा नवमी तक नंगे पांव गांव-गांव पहुंच रहीं छत्र मंडलियां, दियोली में गूंज रहे जाहरवीर गुग्गा जी के जयकारे

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रक्षाबंधन से गुग्गा नवमी तक नंगे पांव गांव-गांव पहुंच रहीं छत्र मंडलियां
दियोली में गूंज रहे जाहरवीर गुग्गा जी के जयकारे, सदियों पुरानी लोक परंपरा आज भी कायम
दौलतपुर चौक, 29 अगस्त। (संजीव डोगरा)
गगरेट विधानसभा क्षेत्र के दियोली व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों जाहरवीर गुग्गा जी की भक्ति से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। रक्षाबंधन के पावन अवसर से शुरू हुई छत्र मंडलियों की यात्रा गुग्गा नवमी तक जारी रहेगी। मंडलियां गांव-गांव और घर-घर पहुंचकर जाहरवीर गुग्गा जी की महिमा का गुणगान कर रही हैं। इस दौरान ढोलक की थाप, चिमटे की झंकार और गुग्गा जी के जयकारों से गांवों की गलियां गूंज रही हैं।दियोली गुग्गा मंडली के सदस्यों के अनुसार यह क्षेत्र की सदियों पुरानी लोक धार्मिक परंपरा है, जिसे श्रद्धालु पूरी आस्था और निष्ठा के साथ निभाते आ रहे हैं। मंडली के सदस्य नंगे पांव देव-छत्र लेकर गांवों में भ्रमण करते हैं और भजन-कीर्तन करते हुए श्रद्धालुओं के घरों तक पहुंचते हैं। जहां भी मंडली पहुंचती है, ग्रामीण देव-छत्र के समक्ष शीश नवाकर परिवार की सुख-शांति, खुशहाली और समृद्धि की कामना करते हैं।श्रद्धालु भेंट कर रहे अनाज और नकद राशि गुग्गा जी की छत्र मंडलियों का ग्रामीणों द्वारा श्रद्धा और उत्साह के साथ स्वागत किया जा रहा है। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार देव-छत्र को अनाज, फल, वस्त्र और नकद राशि भेंट कर रहे हैं। मंडली के साथ चल रहे श्रद्धालु नंगे पांव इस धार्मिक अनुष्ठान को पूरा कर रहे हैं।
युवा पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ रही परंपराआधुनिक दौर में जहां कई पारंपरिक लोक रीति-रिवाज धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं, वहीं दियोली और आसपास के गांवों में जाहरवीर गुग्गा जी की यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ जीवंत है। खास बात यह है कि स्थानीय युवा भी इस धार्मिक आयोजन में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। युवाओं की भागीदारी से न केवल परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है, बल्कि नई पीढ़ी अपनी लोक आस्था, संस्कृति और पूर्वजों से मिली धार्मिक विरासत से भी जुड़ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि गुग्गा जी की छत्र मंडलियों का गांवों में पहुंचना उनके लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे, सामाजिक एकता और लोक संस्कृति का प्रतीक भी है। रक्षाबंधन से शुरू हुआ यह श्रद्धा और सेवा का सिलसिला गुग्गा नवमी तक जारी रहेगा।

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