सोलहसिंघी धार ऊना हिमाचल प्रदेश में पीपलू से उतर दिशा में पीपलू _भ्यांवी सड़क पर स्थित घलूं गांव से ठीक नीचे पश्चिम की ओर लगभग दो किलोमीटर नीचे उतर कर धार के मध्य में सुंदर प्राकृतिक गुफा है। दूसरा रास्ता बंगाणा से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर जसाणा गांव स्थित है। यहां से 2 किलोमीटर की दूरी पर सोलहसिंघी धार के मध्य में सिद्ध आसरी गुफा स्थित है। दोनों ही रास्ते जंगल से होकर जाते हैं और शानदार ट्रैक रूट और जैव विविधता से भरपूर है। यह स्थान अत्यंत प्राचीन माना जाता है। यह गुफा सिद्ध परंपरा में प्रसिद्ध बाबा औघड़नाथ जी की तपोस्थली मानी जाती है।
औघड तपस्वी शैव साधुओं का एक संप्रदाय है जो हिंदू धर्म के एक अनोखे और चरम रूप का पालन करते हैं। वे अपने विचित्र और अपरंपरागत अनुष्ठानों के लिए जाने जाते हैं।नाथयोगी संप्रदाय में ऐसे योगी, जो कान नहीं छिदवाते और कुंडल धारण नहीं करते, औघड़ कहलाते हैं। औघड़ जालंधरनाथ के और कनफटे मत्स्येंद्रनाथ तथा गोरखनाथ के अनुयायी माने जाते हैं, क्योंकि प्रसिद्ध है कि जालंधरनाथ औघड़ थे और मत्स्येंद्रनाथ एवं गोरखनाथ कनफटे। लोक विश्वास है कि यहां अनेक साधु संतों और महात्माओं ने पूजा अर्चना कर अनेक रिद्धि सिद्धियां प्राप्त की थीं। समय समय पर यहां अनेक चमत्कारी घटनाएं घटी हैं। इस स्थान पर शिव पार्वती की मूर्ति एक शिवलिंग भी है। गुफा में एक चबूतरे पर औघड नाथ जी और बाबा बालक नाथ जी की पिंडिया भी हैं। गुफा में शिलाओं पर नाग की प्रतिमाएं भी उकेरी गई हैं। यह गुफा एक विशाल चट्टान के नीचे प्राकृतिक रूप से बनी हुई है, जो अत्यंत ही खूबसूरत,अलौकिक और रहस्यमय है।लगभग 40 वर्ष पूर्व ही इस गुफा में दीवार बनवाई गई थी।लोकमान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में यहां स्थित गुफा में एक बाबा रहते थे। वे प्राय तपस्या में लीन रहते थे। गुफा के समीप ग्वाले अपनी गाय और भैंसे चराने हेतु यहां आया करते थे। एक दिन बाबा ने जब ग्वालों से दूध मांगा तो ग्वालों ने दूध दिनों में असमर्थता व्यक्त की। उन्होंने बाबा से कहा कि हमारी कोई भी गाय और भैंसे दूध नहीं देती है।तब बाबा ने अपनी चिप्पी एक औसर भैंस के नीचे रखी ।ग्वाले ये देख कर आश्चर्य चकित हो गए कि एक औसर भैंस ने दूध देना शुरू कर दिया और बाबा की चिप्पी दूध से भर गई। बाबा ने ग्वालों से कहा कि इस घटना का उल्लेख किसी से न करें। लेकिन ग्वालों ने यह बात अपने घर वालों को बता दी ।जब उनके घर वाले इस स्थान पर पहुंचे तो उन्हें वहां कोई नजर नहीं आया। तदोपरांत गांव वालों को बाबा ने स्वप्न दिया और कहा कि में पिंडी रूप में यहां विद्यमान हूं और जो भी यहां पिंडी की पूजा अर्चना करने आयेगा उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होगी। जन श्रुतियों के अनुसार एक अन्य घटना में इस गुफा के ऊपर ऊंची पहाड़ी पर दो बैल आपस में उलझ गए और एक दूसरे को भयंकर रूप से मारने लगे। लुढ़कते लुढ़कते वे इस गुफा तक पहुंच गए और दोनों को एक खरोंच तक नहीं आई। ऐसी ही कई अलौकिक घटनाएं यहां होती ही रहती हैं। इस स्थल पर प्रति वर्ष ज्येष्ठ मास के 7वें प्रविष्टें को भंडारे का आयोजन किया जाता है।इसके अलावा श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर यहां आकर श्रद्धा सुमन भेंट करते हैं। पिछले 42 सालों से अधिक समय से यहां आगरा उत्तर प्रदेश से आए महंत श्री मुरखा दास जी मंदिर परिसर में ही छोटी सी गुफा में साधना कर रहे हैं। प्राकृतिक जलस्रोत और सुंदर जल प्रपात भी है। मिट्टी के पहाड़ों पर वर्षा के पानी के कारण प्राकृतिक रूप से अनेक सुंदर भू कलाकृतियां बनी हुई हैं। पूरा क्षेत्र शांत,रहस्यमय, हरियाली और जैव विविधता से भरा हुआ है। यहां पीपल, जामुन और बरगद के कई प्राचीन वृक्ष हैं। मंदिर परिसर के सौंदयकरण और विस्तारीकरण का कार्य करवाया जा रहा है। स्थानीय लोगों और भक्तजनों की सुविधा के लिए सराय का निर्माण किया जा रहा है। इस पूरे क्षेत्र को धार्मिक, आस्था ,ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।
