Sunday, September 20, 2026
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रेशा रहित बिंगा का कचालू अब देशभर में दर्ज, किसानों के लिए खुली रॉयल्टी की राह

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बिंगा की अनूठी पारंपरिक फसल को मिला देश में मुकाम ‘स्वाद कचालू’ के नाम से हुआ राष्ट्रीय पंजीकरण, केंद्रीय कृषि मंत्रालय के पीपीवीएफआरए से मिली आधिकारिक मुहर, धर्मपुर एफपीओ और केवीके के साझा कदम से खुली किसानों के लिए रॉयल्टी की राह, बिना रेशे वाले इस कचालू की थालियों से लेकर बाजारों तक जबर्दस्त मांग

मंडी जनपद के धर्मपुर क्षेत्र स्थित बिंगा गांव की सदियों पुरानी खेती ने अब पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई है। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय से जुड़े संस्थान पीपीवीएफआरए (पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण) ने यहां पैदा होने वाली खास अरबी को आधिकारिक रूप से ‘स्वाद कचालू’ वैरायटी का तमगा दिया है। धर्मपुर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी और केवीके सुंदरनगर की साझा पहल के चलते यह कामयाबी संभव हो पाई। संस्था के सचिव भूपेंद्र सिंह का कहना है कि बिंगा की इस देसी उपज की मिठास और बनावट के चलते प्रदेश के भीतर व बाहर भारी मांग रहती है। करीब अठारह महीने की जांच-पड़ताल और दस्तावेजी प्रक्रिया के उपरांत यह पंजीकरण हासिल हुआ है। आगे की योजना इसे धर्मपुर के दूसरे गांवों तक विस्तारित करने की है, जिससे ज्यादा पैदावार के साथ ग्रामीण उत्पादकों की जेब में सीधा मुनाफा पहुंच सके।

मध्य हिमालयी व्यंजनों में कचालू को बेहद चाव से परोसा जाता है। खासकर मांगलिक अवसरों और दावतों में इसके दम की खुशबू हर किसी को आकर्षित करती है। गांव के काश्तकार विद्या सागर ठाकुर का साझा अनुभव है कि आम कचालू को पकाते समय उसमें अक्सर कड़ा रेशा निकलता है, मगर बिंगा की इस मिट्टी में उगने वाले कचालू की खासियत ही इसका एकदम रेशा-मुक्त और मक्खन जैसा घुलनशील होना है। यही गुण इसे अन्य किस्मों से अलग और महंगा बनाता है, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार कर लिया गया है।

कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर के मुख्य विशेषज्ञ डॉ. पंकज सूद के अनुसार, देश में पारंपरिक बीजों और किसानों की बौद्धिक संपदा को सुरक्षित रखने के मकसद से ही वर्ष 2001 में इस केंद्रीय प्राधिकरण की नींव रखी गई थी। स्वाद कचालू के विधिवत पंजीकृत हो जाने के बाद अब कोई भी बाहरी व्यक्ति या कंपनी बिंगा की इस किस्म के बीज का गैर-कानूनी इस्तेमाल नहीं कर पाएगी। अगर कोई इस फसल का व्यवसायिक लाभ उठाना चाहता है, तो उसे तय नियमों के तहत एफपीओ को बाकायदा रॉयल्टी देनी होगी। इससे इलाके के मेहनतकश उत्पादकों को न केवल कानूनी संबल मिलेगा, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी।

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