दैनिक जागो वर्ल्ड ! ऊना , ब्यूरो रिपोर्ट

जिला ऊना के हरोली विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत गांव इसपुरी के दवामी मार्ग पर वर्ष 2015 में निर्मित बंदर नसबंदी केंद्र आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। लाखों रुपये की लागत से तैयार किया गया यह केंद्र अब नशेड़ियों और शराबियों का अड्डा बन चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन विभाग द्वारा भवन की कोई देखरेख नहीं की जा रही, जिसके चलते परिसर पूरी तरह उपेक्षा का शिकार हो गया है।

जानकारी के अनुसार, इस केंद्र का शिलान्यास 23 अगस्त 2013 को तत्कालीन वन एवं मत्स्य मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी तथा तत्कालीन उद्योग एवं जनसंपर्क मंत्री मुकेश अग्निहोत्री द्वारा किया गया था। वहीं, इसका उद्घाटन 26 जून 2016 को किया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि केंद्र कुछ समय तक संचालित हुआ, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया गया और तब से यह वीरान पड़ा है।

क्षेत्र में बंदरों की बढ़ती संख्या और किसानों की फसलों को हो रहे नुकसान को देखते हुए इस केंद्र की स्थापना की गई थी। उस समय सरकार द्वारा बंदरों को पकड़कर लाने वालों को प्रोत्साहन राशि भी दी जाती थी। हालांकि वर्तमान में केंद्र बंद होने से बंदरों की समस्या फिर से बढ़ने लगी है।

मौके पर निरीक्षण के दौरान परिसर में शराब की खाली बोतलें, बीयर के कैन और अन्य आपत्तिजनक सामान बिखरा मिला। इससे स्पष्ट होता है कि भवन असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुका है। परिसर में लगे चार सोलर लाइट पोलों से बैटरियां और लाइटें चोरी हो चुकी हैं। इसके अलावा पानी की टोटियां और स्ट्रीट लाइटें भी गायब पाई गईं। परिसर में झाड़ियां और घास उग चुकी हैं, जबकि देखरेख के लिए कोई स्थायी कर्मचारी तैनात नहीं है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार स्टाफ की कमी के कारण यहां कोई नियमित कर्मचारी नहीं लगाया गया है। कभी-कभार वन विभाग के कर्मचारी निरीक्षण के लिए पहुंचते हैं, लेकिन परिसर की साफ-सफाई और रखरखाव की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

इस बीच हैरानी की बात यह भी है कि लंबे समय से बंद पड़े इस केंद्र में हाल ही में बिजली का नया मीटर लगाया गया है, जबकि भवन का उपयोग नहीं हो रहा है।
इस संबंध में डीएफओ ऊना विकल्प यादव ने बताया कि यह भवन पहले वाइल्ड लाइफ विभाग के अधीन था और पिछले दो वर्षों से वन विभाग के पास है। उन्होंने कहा कि भवन की वर्तमान स्थिति की जानकारी उच्च अधिकारियों को दी जाएगी।

यदि विभाग भविष्य में इस भवन का उपयोग करना चाहता है तो आवश्यक मरम्मत और सुविधाएं उपलब्ध करवाकर इसे दोबारा शुरू करने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि विभाग की आवश्यकता नहीं रही तो जिला प्रशासन से चर्चा कर भवन को किसी अन्य विभाग को हस्तांतरित करने पर भी विचार किया जा सकता है।
