जागो ! होशियारपुर ब्यूरो रिपोर्ट

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा होशियारपुर के गौतम नगर आश्रम में महिला सशक्तिकरण प्रकल्प संतुलन के अंतर्गत ‘मातृ शक्ति तुभ्यं नमः’ विषय पर एक विशाल आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस भव्य आयोजन में सत्संग, प्रेरणादायक नाटिका, नृत्य और विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियों के माध्यम से नारी के वास्तविक और दिव्य स्वरूप को दर्शाया गया। कार्यक्रम का सफल मंच संचालन सोनिया जी द्वारा किया गया। उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी राजविद्या भारती जी एवं साध्वी रेणु भारती जी ने स्पष्ट किया कि वर्तमान भौतिकवादी युग में मनुष्य बाहरी दिखावे और शारीरिक सुंदरता को ही सर्वस्व मान बैठा है, जबकि वास्तविक और शाश्वत सुंदरता मनुष्य के आंतरिक संस्कारों, उच्च विचारों और आध्यात्मिक पवित्रता में निहित है। उन्होंने त्रेता युग का सटीक उदाहरण देते हुए बताया कि जब शूर्पणखा अपने रूप-यौवन के अहंकार में प्रभु श्री राम के पास गई, तो उसे तिरस्कार मिला, वहीं दूसरी ओर माता शबरी, जो वनवासिनी और वृद्ध थीं, ने अपने आंतरिक सौंदर्य और निश्छल भक्ति से भगवान राम का हृदय जीत लिया।
साध्वी जी ने भगवान परशुराम जी की माता रेणुका जी का अत्यंत गूढ़ वृत्तांत सुनाते हुए बताया कि उनकी पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी प्रबल थी कि वे गीली और कच्ची मिट्टी के घड़े में भी सरलता से पानी भर लाती थीं। परंतु एक दिन, मात्र एक पल के लिए आए गलत विचार ने उनके उस तपोबल और पवित्रता को नष्ट कर दिया। यह प्रसंग सचेत करता है कि मन की निरंतर निर्मलता कितनी आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सत्संगति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में साथी श्री राधा जी की सखी विशाखा के समान होना चाहिए, जो सदैव परमात्मा और आध्यात्मिकता से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करे। तदोपरांत, एक अत्यंत प्रभावशाली नाटिका के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जो सुंदरता कभी फीकी नहीं पड़ती, उसे केवल ‘ब्रह्मज्ञान’ (Brahm Gyan) द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। आज समाज में कन्या भ्रूण हत्या, नशाखोरी और नैतिक पतन जैसी गंभीर व्याधियां इसलिए विकराल रूप ले चुकी हैं क्योंकि इंसान अपनी चेतना से कट चुका है। जब एक नारी ईश्वर और सच्चे गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर अपने भीतर छिपी अनंत मातृ शक्ति को जागृत करती है, केवल तभी वह एक कुरीति-मुक्त समाज की नींव रख सकती है और आने वाली पीढ़ियों में श्रेष्ठ संस्कारों का सिंचन कर सकती है।
