Wednesday, October 21, 2026
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सूरत में सीवरेज का पानी पीने लायक बनाया, बेचकर निगम कमा रहा करोड़ों, चंडीगढ़ में बदबू भी चुनौती

दैनिक जागो वर्ल्ड !सूरत

सूरत ने सीवरेज के पानी को अत्याधुनिक तकनीक से ट्रीट कर पीने योग्य बनाया है और इसे उद्योगों को बेचकर करोड़ों का राजस्व कमा रहा है। वहीं, चंडीगढ़ में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट पर खर्च के बावजूद पानी की गुणवत्ता, दुर्गंध और आपूर्ति की समस्या बनी हुई है।सीवरेज के इस्तेमाल किए गए पानी को समस्या मानकर नालों में बहाने के बजाय गुजरात के सूरत ने इसे संसाधन और कमाई का जरिया बना दिया है।ऑल इंडिया मेयर्स काउंसिल के 118वें सम्मेलन में पहुंचीं सूरत की मेयर मायाबेन धर्मेंद्रभाई मेवानी ने अपने शहर का मॉडल साझा करते हुए दावा किया कि सीवरेज के पानी को अत्याधुनिक तकनीक से ट्रीट करने के बाद इतना साफ किया जा रहा है कि उसे पीया जा सकता है। उन्होंने बताया कि सूरत आए मंत्री और दूसरे बड़े पदाधिकारी भी यह ट्रीटेड पानी पी चुके हैं।

मेयर ने कहा कि शहरों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में ठोस कचरे के साथ इस्तेमाल किए गए पानी का प्रबंधन भी शामिल है। यदि सीवरेज के पानी को सही तकनीक और निर्धारित मानकों के अनुसार ट्रीट किया जाए तो उसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।उनके मुताबिक इसे केवल सिंचाई तक सीमित रखने की जरूरत नहीं है, बल्कि उचित स्तर का ट्रीटमेंट होने पर इसे पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सूरत में इसी दिशा में काम किया जा रहा है।सूरत के इस मॉडल की खास बात यह है कि ट्रीटेड पानी को उद्योगों को बेचकर नगर निगम ने राजस्व का नया स्रोत तैयार किया है। 2025 में सूरत नगर निगम ट्रीटेड वेस्टवॉटर बेचकर करीब 140 करोड़ रुपये राजस्व अर्जित कर चुका था। निगम ने 2030 तक वेस्टवॉटर के 70 प्रतिशत और 2035 तक 100 प्रतिशत ट्रीटमेंट का लक्ष्य भी रखा है।मेयर मायाबेन ने सूरत के मल्टी ट्रांसपोर्ट सिस्टम की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मेट्रो, एयरपोर्ट और बस जैसे सार्वजनिक परिवहन के माध्यमों को आपस में जोड़ने से यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह जाने में सुविधा होती है।उन्होंने कहा कि कभी सूरत को देश के सबसे गंदे शहरों में गिना जाता था, लेकिन लगातार प्रयासों के बाद आज वही शहर डायमंड सिटी और गोल्डन सिटी जैसे नामों से जाना जाता है।

सूरत में ट्रीटेड सीवरेज वॉटर को बड़े पैमाने पर दोबारा इस्तेमाल करने के साथ उद्योगों को बेचकर नगर निगम करोड़ों रुपये कमा रहा है। इसके उलट चंडीगढ़ में एसटीपी अपग्रेड करने पर 500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बाद भी ट्रीटेड पानी की गुणवत्ता, दुर्गंध और नियमित सप्लाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं।चंडीगढ़ में ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल सिंचाई और अन्य गैर-पेय कार्यों में किया जाता है। लेकिन कई जगहों पर इस पानी की दुर्गंध को लेकर शिकायतें आती रही हैं। निगम सदन में भी एसटीपी के पानी की गुणवत्ता और सप्लाई का मुद्दा कई बार उठ चुका है।जिन बड़े मकानों और अन्य संस्थानों ने निगम से ट्रीटेड पानी के कनेक्शन ले रखे हैं, वहां भी समय पर सप्लाई नहीं मिलने की शिकायतें सामने आती रही हैं। चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से ट्रीटेड वॉटर के इस्तेमाल का नेटवर्क बढ़ाने पर काम चल रहा है।शहर में करीब 165 किलोमीटर टर्शियरी ट्रीटेड वॉटर लाइन बिछाने की योजना है, जिसके जरिए पार्कों, ग्रीन बेल्ट, सरकारी संस्थानों और बड़े मकानों तक ट्रीटेड पानी पहुंचाने का लक्ष्य है।ऐसे में तुलना साफ हसूरत ने सीवरेज के पानी को ट्रीट कर उसे संसाधन और राजस्व के स्रोत में बदल दिया है, जबकि चंडीगढ़ अभी ट्रीटेड पानी की गुणवत्ता, दुर्गंध और नियमित वितरण की समस्या से पूरी तरह पार नहीं पा सका है।करनाल में नहर किनारे बना रिवर फ्रंटसम्मेलन में करनाल की मेयर रेनू बाला गुप्ता ने भी अपने शहर के विकास मॉडल की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह लगातार तीसरी बार करनाल की मेयर बनी हैं और करीब 12 साल से मेयर के पद पर हैं। इस दौरान शहर में कई विकास कार्य करवाए गए।उन्होंने बताया कि पश्चिम यमुना कैनाल के किनारे कभी गोबर के ढेर और गंदगी रहती थी। अब इसी क्षेत्र को रिवर फ्रंट का रूप दिया गया है। यहां फाउंटेन, पार्क, पार्किंग सहित कई सुविधाएं विकसित की गई हैं। उन्होंने कहा कि लगातार विकास कार्यों के कारण इस क्षेत्र की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है।

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