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उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है, जो भविष्य में हिमस्खलन और बर्फ-चट्टान टूटने का बड़ा कारण बन सकते हैं।

सुमन सेमवाल, देहरादून। उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में मौजूद सैकड़ों ऐसे ग्लेशियर, जो खड़ी चट्टानों से लटके हुए हैं (हैंगिंग ग्लेशियर), भविष्य में हिमस्खलन और बर्फ-चट्टान टूटने की बड़ी घटनाओं का कारण बन सकते हैं। पहली बार न सिर्फ हैंगिंग ग्लेशियर की पूरी तस्वीर सामने आई है, बल्कि इनकी स्थिति को लेकर चेतावनी भी जारी की गई है।विज्ञनियों के समूह ने विस्तृत अध्ययन करते हुए अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग (लटकते) ग्लेशियर चिह्नित किए हैं। अध्ययन के अनुसार इनमें से कई ग्लेशियरों के नीचे बदरीनाथ, माणा, जोशीमठ, तपोवन, हेमकुंड साहिब, प्रमुख सड़कें और जलविद्युत परियोजनाएं स्थित हैं, इसलिए इनकी लगातार निगरानी जरूरी है। यह अध्ययन नेचुरल हजार्ड में प्रकाशित किया गया हैअध्ययन में भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी), बेंगलुरु के सेंटर फार अर्थ साइंसेज (नंदू कृष्णन और डा अनिल वी कुलकर्णी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) भुवनेश्वर (डा आशिम सत्तार तथा डीआरडीओ के डिफेंस जियोइन्फॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट चंडीगढ़ ( डा हरेंद्र सिंह नेगी) ने संयुक्त रूप से किया।

शोधकर्ताओं ने सेंटिनल-2 उपग्रह चित्रों, डिजिटल एलिवेशन माडल और ग्लैबटाप-2 माडल की मदद से पूरे अलकनंदा बेसिन का विश्लेषण किया। जिसमें पाए गए 219 हैंगिंग ग्लेशियर का कुल क्षेत्रफल करीब 71.7 वर्ग किमी पाया गया।वहीं, कुल अनुमानित बर्फ आयतन 2.39 घन किमी से अधिक मिला। इनमें से भी 0.74 घन किमी बर्फ सबसे अस्थिर (हैंगिंग मास) के रूप में चिन्हित की गई। ये ग्लेशियर औसतन 33 डिग्री ढलान पर स्थित हैं और लगभग 4,018 से 6,759 मीटर की ऊंचाई के बीच पाए गए।विज्ञनियों ने यह भी स्पष्ट किया कि करीब 55 प्रतिशत हैंगिंग ग्लेशियर बड़े मुख्य ग्लेशियरों के ऊपर लटके हैं। यदि इनका कुछ हिस्सा टूटता भी है, तो वह पहले मुख्य ग्लेशियर पर गिरता है, इसलिए उनसे सीधे आबादी को अपेक्षाकृत कम खतरा है। लेकिन जो ग्लेशियर सीधे घाटियों या मानव गतिविधियों वाले क्षेत्रों के ऊपर हैं, उनकी अलग से निगरानी की जरूरत है।विज्ञनियों ने यह भी स्पष्ट किया कि करीब 55 प्रतिशत हैंगिंग ग्लेशियर बड़े मुख्य ग्लेशियरों के ऊपर लटके हैं। यदि इनका कुछ हिस्सा टूटता भी है, तो वह पहले मुख्य ग्लेशियर पर गिरता है, इसलिए उनसे सीधे आबादी को अपेक्षाकृत कम खतरा है। लेकिन जो ग्लेशियर सीधे घाटियों या मानव गतिविधियों वाले क्षेत्रों के ऊपर हैं, उनकी अलग से निगरानी की जरूरत है।विज्ञनियों ने कहा कि वर्ष 2021 की चमोली आपदा जैसी घटनाओं ने दिखाया है कि हिमालय में बर्फ और चट्टान के अचानक टूटने से भारी तबाही हो सकती है। उस आपदा में 206 व्यक्तियों ने जान गंवाई थी और विभिन्न परियोजनाओं/संरचनाओं को गंभीर क्षति पहुंची थी।विज्ञनियों ने कहा कि वर्ष 2021 की चमोली आपदा जैसी घटनाओं ने दिखाया है कि हिमालय में बर्फ और चट्टान के अचानक टूटने से भारी तबाही हो सकती है। उस आपदा में 206 व्यक्तियों ने जान गंवाई थी और विभिन्न परियोजनाओं/संरचनाओं को गंभीर क्षति पहुंची थी।
