Wednesday, October 21, 2026
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काश के फूल: मानसून की विदाई और शरद ऋतु के आगमन का प्राकृतिक संदेश

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कवि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है “फूले काश सकल महि छाई, जिमि वर्षा ऋतु प्रगट बुढ़ाई” (काश में फूल आ गये, तो बरसात खत्म हो गयी है)। _ वैज्ञानिक नाम “सैकेरम स्पॉन्टेनियम” ,संस्कृत – कासेक्षु। मानसून की विदाई और शरद ऋतु के आगमनका संकेत देने वाला यह फूल भारतीय कृषि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह फूल आमतौर पर अगस्त से अक्टूबर के बीच खिलते हैं, जब मौसम में बदलाव आता है। यह एक लंबी घास है और यह पौधा मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़ता है, जिससे मिट्टी ज्यादा उपजाऊ बनती है। रंग और रूप: कास के फूल, जो रोएँदार और सफ़ेद होते हैं, शरद ऋतु में खिलते हैं और प्रकृति में सौंदर्य बिखेरते हैं।
__वहीं इनकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव कम होता है। यह फूल मधुमक्खियों और तितलियों जैसे परागणकों को आकर्षित करते हैं, जिससे जैव विविधता में भी बढ़ोतरी होती है। इतना ही नहीं दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों में भी ये फूल इस्तेमाल होते हैं।कास के पौधे में औषधीय महत्व मिले है। काश के पौधा का सभी भाग यानी जड़, तना, फूल औषधीय गुणों से भरा है। इसे पीसकर लगाने से त्वचा संबंधी समस्या यानी एलर्जी दूर होती है। इसके साथ ही दाद, कंडू, सूजन से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा वात व पित्त संबंधित बिमारी को दूर करने में काश पौधे के जड़ का काढ़ा शरीर की कमजोरी को दूर करने, खाने में रूची बढ़ाने, पेट की जलन कम करने, पथरी की समस्या को दूर करने, रक्तदोष संबंधी बीमारी, मूत्र को अधिक मात्रा में निकालने और दूध की क्षमता बढ़ाने में मददगार हैं। कास के पौधे में पुनर्उत्पत्ति का क्षमता होती है. यह अगस्त के अंत व सितंबर माह में दिखने लगते है और अक्तूबर में अपने मूल स्वरूप में होते है। यह पौधे खर-पतवार की श्रेणी में आते हैं. जो, वर्षा के बाद जमीन के कटाव को रोकते है और मौजूदा खनिज जैसे नाइट्रोजन, फोसफोरस और पोटासियम को बनाए रखने में मदद करते हैं। इसके साथ ही काश से इलाके में पानी की मात्रा अच्छे स्तर पर होने का संकेत मिलता है।

महाकवि कालिदास अपने ऋतुसंहार महाकाव्य में शरद ऋतु के वर्णन में कहते हैं- शरद ऋतु का पदार्पण रमणीय नववधू के समान होता है। पके हुए धान से सुंदर एवं झुकी बालियां तथा खिले हुए कमलों के मुख वाली शरद ऋतु, काश पुष्प का उज्जवल वस्त्र धारण किए हुए मतवाले हंसों के कलरवों का नुपूर पहने हुए अवतरित होती है। कवि ने काशफूल को नववधू के वस्त्र परिधान के रूप में देखा है। साहित्य में काश फूल का बड़ा ही प्रभाव है। इसका कारण भी है। शरद ऋतु को साहित्य में काफी स्थान जो दिया गया है। बांग्ला साहित्य में दुर्गापूजा और शरद ऋतु का एक विशेष महत्व है, जो काशफूल के बिना अछूता है। कवि गुरु रविंद्र नाथ टैगोर अपने ”शापमोचन” नृत्य नाट्य की रचना में काश फूल के संबंध में कहते हैं- यह मन की कालिमां दूर करती है, शुद्धता लाती है, भय दूर कर शांति वार्ता वहन करती है। शुभ कार्य में काश फूल के पत्ते और फूल का उपयोग किया जाता है।
कवि काजी नजरुल इस्लाम ने लिखा है-‘काश फूल मन में सादगी का सिहरन जगाए, मन कहता है कितनी सुंदर है प्रकृति, सृष्टिकर्ता की उत्तम सृष्टि। धार्मिक मान्यता है कि कुश के पौधे के मूल में ब्रह्मा, तना में विष्णु और शिखर भाग में भगवान शिव का वास है. यही कारण है कि विवाह, पूजन और श्राद्ध समेत अन्य धार्मिक कार्यों में कुश का इस्तेमाल किया जाता है। पितृ पक्ष के बाद ढाकी अपने ढाक में काश के फूल बांधकर मां दुर्गा का आह्वान करते हैं।
@शशि पाल प्रवक्ता इतिहास

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