दैनिक जागो वर्ल्ड उज्जैन

उज्जैन में शिप्रा नदी की आरती को लेकर तीर्थ पुरोहितों और महाकाल मंदिर समिति के बीच विवाद गहरा गया है। मंदिर समिति द्वारा बटुकों से आरती कराने के फैसले के विरोध में पुरोहितों ने जल सत्याग्रह किया, जिसे वे 500 साल पुरानी परंपरा का हनन बता रहे हैं।तीर्थ नगरी उज्जैन में मोक्षदायिनी शिप्रा नदी की आरती को लेकर तीर्थ पुरोहितों और महाकाल मंदिर प्रबंध समिति के बीच विवाद गहरा गया है। मंदिर समिति द्वारा श्री महाकालेश्वर वैदिक प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान के 21 बटुकों से शिप्रा आरती कराने के फैसले का तीर्थ पुरोहित लगातार विरोध कर रहे हैं। शनिवार को दूसरे दिन भी बटुकों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच आरती की, जबकि इसके विरोध में तीर्थ पुरोहित शिप्रा नदी में उतर गए और जल सत्याग्रह किया।

तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि शिप्रा तट पर तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और पूजन के साथ नदी की आरती कराने की परंपरा करीब 500 वर्षों से चली आ रही है। उनका आरोप है कि भव्यता और धार्मिक स्वरूप निखारने के नाम पर यह परंपरा उनसे छीनी जा रही है।पुरोहितों का कहना है कि यदि प्रशासन और मंदिर समिति आरती में भव्यता बढ़ाना चाहते हैं तो इसके लिए वे सुझाव देने को तैयार हैं, लेकिन आरती कराने का अधिकार पारंपरिक रूप से तीर्थ पुरोहितों के पास ही रहना चाहिए।

श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति ने गुरुवार शाम रामघाट के समीप शिप्रा आरती की शुरुआत की थी। इसके बाद मंदिर समिति द्वारा संचालित श्री महाकालेश्वर वैदिक प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान के 21 विद्यार्थियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ आरती की। शनिवार को भी इसी व्यवस्था के तहत बटुकों ने शिप्रा आरती की।प्रशासन और मंदिर समिति इस पहल को वैदिक शिक्षा और तीर्थ परंपरा के बेहतर समन्वय के रूप में देख रहे हैं। समिति का तर्क है कि वेदों का अध्ययन कर चुके बटुक धार्मिक आयोजनों को अधिक शास्त्रसम्मत और प्रभावी तरीके से संपन्न करा सकते हैं।महाकाल मंदिर समिति का कहना है कि शिप्रा आरती का आयोजन पूरी तरह निश्शुल्क होगा। समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य तीर्थ पुरोहितों से जुड़ी पारंपरिक व्यवस्थाओं में किसी तरह का हस्तक्षेप करना नहीं है।समिति के मुताबिक बटुकों से आरती कराने के पीछे उद्देश्य वैदिक शिक्षा को प्रोत्साहन देना और धार्मिक आयोजनों में प्रशिक्षित विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ाना है।मंदिर समिति की नई व्यवस्था के खिलाफ तीर्थ पुरोहितों का विरोध लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा। शनिवार को पुरोहित शिप्रा नदी में उतर गए और जल सत्याग्रह कर अपना विरोध दर्ज कराया। उनका कहना है कि आरती की परंपरा में बदलाव से पहले उनसे संवाद किया जाना चाहिए था।
