Thursday, October 15, 2026
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संघर्ष से राष्ट्रकवि तक: रामधारी सिंह दिनकर की प्रेरणादायी जीवन-यात्रा”

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रामधारीसिंहदिनकर जी की जयंती पर विशेष……

“राष्ट्रकवि” के रूप में समादृत और लोकप्रिय रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय ज़िले के सिमरिया ग्राम में एक कृषक परिवार में हुआ। बचपन संघर्षमय रहा जहाँ स्कूल जाने के लिए पैदल चल गंगा घाट जाना होता था, फिर गंगा के पार उतर पैदल चलना पड़ता था। 1928 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की। 1932 में पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा पास करने के बाद आजीविका के लिए पहले अध्यापक बने, फिर 1934 में बिहार सरकार में सब-रजिस्टार की नौकरी की। अँग्रेज़ सरकार के युद्ध-प्रचार विभाग में रहे और उनके ख़िलाफ़ ही कविताएँ लिखते रहे।आज़ादी के बाद मुज़फ़्फ़रपुर कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष बनकर गए। 1952 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुन लिया गया जहाँ दो कार्यकालों तक उन्होंने संसद सदस्य के रूप में योगदान किया। इसके उपरांत वह भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति नियुक्त किए गए और इसके एक वर्ष बाद ही भारत सरकार ने उन्हें (1965 से 1971) अपना हिंदी सलाहकार नियुक्त कर पुनः दिल्ली बुला लिया। ओज, विद्रोह, आक्रोश के साथ ही कोमल श्रृंगारिक भावनाओं के कवि दिनकर की काव्य-यात्रा की शुरुआत हाई स्कूल के दिनों से हुई जब उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा प्रकाशित ‘युवक’ पत्र में ‘अमिताभ’ नाम से अपनी रचनाएँ भेजनी शुरू की। 1928 में प्रकाशित ‘बारदोली-विजय’ संदेश उनका पहला काव्य-संग्रह था। उन्होंने मुक्तक-काव्य और प्रबंध-काव्य—दोनों की रचना की। मुक्तक-काव्यों में कुछ गीति-काव्य भी हैं। कविताओं के अलावे उन्होंने निबंध, संस्मरण, आलोचना, डायरी, इतिहास आदि के रूप में विपुल गद्य लेखन भी किया।
*प्रमुख कृतियाँ

मुक्तक-काव्य: प्रणभंग, रेणुका, हुँकार, रसवंती, द्वंद्वगीत, सामधेनी, बापू, धूप-छाँह, इतिहास के आँसू, धूप और धुआँ, मिर्च का मज़ा, नीम के पत्ते, सूरज का ब्याह, नील-कुसुम, हारे को हरिनाम सहित दो दर्जन से अधिक संग्रह।प्रबंध-काव्य: कुरुक्षेत्र (1946), रश्मिरथी (1951), उर्वशी (1961)गद्य : मिट्टी की ओर, रेती के फूल, संस्कृति के चार अध्याय, उजली आग, वेणुवन, शुद्ध कविता की खोज, हे राम!, संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ, मेरी यात्राएँ, दिनकर की डायरी, विवाह की मुसीबतें सहित दो दर्जन से अधिक कृतियाँ। राष्ट्रपतिप्रसाद ने उन्हें वर्ष 1959 में ‘पद्म विभूषण’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। रामधारी सिंह दिनकर को ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से और काव्य-कृति ‘उर्वशी’ के लिए 1961में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी स्मृति में भारत सरकार द्वारा डाक-टिकट भी जारी किया गया। 24 अप्रैल, 1974 को दिनकर जी अपने आपको अपनी कविताओं में हमारे बीच जीवित रखकर सदा के लिए अमर हो गए।
@शशि पाल प्रवक्ता इतिहास रा वा मा पाठशाला जटहेड़ी ऊना हिमाचल प्रदेश

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