Wednesday, October 21, 2026
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शहीद-ए-आज़म भगत सिंह: क्रांति, विचार और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा — जयंती पर विशेष

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भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायपुर जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। सिर्फ भगत सिंह ही नहीं, बल्कि इनके पिता और चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह भी जानें-मानें स्वतंत्रता सेनानी थे। भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई डीएवी हाई स्कूल लाहौर से की थी।13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में सभा के दौरान जो कुछ भी हुआ उसका काफी गहरा असर 12 वर्षीय भगत सिंह पर पड़ा। इसी दौरान उन्होंने यह कसम खायी कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ वह आजादी की लड़ाई लड़ेंगे।
इसके बाद भगत सिंह ने अपन पढ़ाई छोड़ दी और भगत सिंह और उनके साथियों ने “नौजवान भारत सभा” की स्थापना मार्च 1926 में की थी। इसका उद्देश्य किसानों और श्रमिकों के युवाओं को एकजुट करके ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांति को बढ़ावा देना था। यह मूल रूप से लाहौर में स्थापित किया गया था।
राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर भगत सिंह ने “काकोरी कांड” को अंजाम दिया।काकोरी कांड 9 अगस्त, 1925 को हुई एक घटना थी जिसमें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के क्रांतिकारियों ने लखनऊ से सहारनपुर जा रही ट्रेन से ब्रिटिश सरकार का सरकारी खजाना लूटा था, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम के लिए धन जुटाना था। आगे चलकर उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु के साथ मिलकर लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे जेपी सांडर्स को मार डाला। इसमें उनकी सहायता

“हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” (HSRA) जिसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के रूप में भी जाना जाता है, की स्थापना 1928 में नई दिल्ली के फिरोज शाह कोटला में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव और कुछ अन्य लोगों ने की थी। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर अलीपुर रोड में मौजूद ब्रिटिश इंडिया की इमरजेंसी सेंट्रल असेंबली के सभागार में अंग्रेजी हुकूमत को जगाने के लिए बम और पर्चे फेंके थे। उनके शब्दों में बम और पिस्तौल क्रांति नहीं करते, क्रांति की तलवार विचारों के पत्थर पर तेज़ होती है।” भगत सिंह का “इंकलाब जिंदाबाद” का जो नारा था वह सभी के बीच काफी पसंद किया गया और प्रसिद्ध हुआ। उनके शब्दों में “वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी आत्मा को कुचलने में सक्षम नहीं होंगे।”
7 अक्टूबर 1930 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी। इसके लिए 24 मार्च 1931 के दिन को चुना गया था। फांसी की सजा तय होने के बावजूद भी अंग्रेजी हुकूमत उनसे इतना डरी हुई थी कि तय से तारीख से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी उनकी गवाही देने वाले हंसराज बोहरा, जय गोपाल, और फणींद्रनाथ घोष जैसे कई क्रांतिकारियों के कारण हुई थी, जिन्होंने लाहौर षडयंत्र केस में सरकार का पक्ष लिया और भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी। इन गवाहों की गवाही ने उन्हें फाँसी की सजा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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भगत सिंह ने कई लेख और पुस्तकएँ लिखीं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं “मैं नास्तिक क्यों हूँ” और “युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए”. उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में “द रेड पैम्फलेट”, “जेल डायरी और अन्य लेखन” और विभिन्न पत्रों का संग्रह शामिल है. उनके लेखों में धर्म, समाजवाद और क्रांति जैसे विषयों पर उनके विचार शामिल थे, जो उनके विचारों को दर्शाते हैं।
“ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे। अच्छा रुख़सत। खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं।”
@शशि पाल प्रवक्ता इतिहास

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